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Tuesday, November 20, 2018

पालतूकरण (प्राणियों का)

पालतूकरण (प्राणियों का)


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मनोरंजन के लिए जंगली पशुओं के पालन-पोषण की कला का पहले-पहल विकास हुआ। कब से इस कला का प्रारंभ हुआ, इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता। प्राचीनतम प्रस्तरयुग में कुत्तों को ही मनुष्य ने सर्वाधिक पालतू बनाया। उस समय के मनुष्य असभ्य, जंगली, बनजारे और शिकारी होते थे। शिकार में ये कुत्ते उन्हें मदद देने के काम में लाए जाते थे। उस समय बच्चों के मनोरंजन के लिए मनुष्य भेड़ियों के बच्चों को पकड़ लाते तथा उन्हें बाँधकर रखते होंगे। इसी से प्राणियों के पालतूकरण की नींव पड़ी। इसके बहुत समय बाद मनुष्य कृषक तथा चरवाहा बना और उसने नियमित रूप से पशुओं को पालना शुरू कर दिया। ऐसा समझा जाता है कि आज से करीब १०,००० वर्ष पूर्व दक्षिण रूस में पशुपालन शुरू हुआ। भेड़ बकरियों का पालन भी प्राय: इसी समय शुरू हुआ। सुअर का पालतूकरण ८,००० वर्ष पूर्व हुआ माना जाता है। घोड़ों का पालतूकरण ५,००० वर्ष पूर्व मध्य एशिया के जंगली प्रदेशों में हुआ माना जाता है। पहले इनका पालतूकरण मांस के लिए, किंतु बाद में सवारी करने, बोझ ढोने तथा अंत में गाड़ी खींचने के लिए होने लगा। गदहों का पालतूकरण भी लगभग ५,००० वर्ष पूर्व पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ्रीका में शुरू हुआ। बिल्ली का पालतूकरण उत्तरी अफ्रीका में संभवत: १२ हजार वर्ष पूर्व शुरू हुआ। पक्षियों का पालतूकरण ५,००० वर्ष पूर्व कबूतर से हुआ, फिर मुर्गियों, हाथियों, ऊँटों और याकों का पालतूकरण हुआ। मधुमक्खियों और रेशम के कीड़ों का पालतूकरण भी बहुत पुराना है।

पालतूकरण का उद्देश्य[संपादित करें]

मनुष्य अपने स्वार्थ और लाभ के लिए प्राणियों का पालन करता चला आ रहा है। शिकार के लिए कुत्तों, घोड़ों तथा बाद में चीता और बाज आदि का उपयोग शुरू हुआ। पीछे घोड़े, गदहे, ऊँट आदि को सवारी के काम में तो लाते ही रहे, पर साथ ही साथ इनके अनेक अन्य काम भी लेते रहे। बैल, बारहसिंगे, याक, घोड़े आदि सब गाड़ी खींचने, हल चलाने तथा सिंचाई के लिए पानी निकालने एवं बोझ ढोने में सहायता करते थे। इन कामों के अतिरिक्त मांस के लिए बैल, भेड़, सुअर, बकरी, खरगोश एव नाना प्रकर की चिड़ियाँ पाली जाने लगीं। मांस के अतिरिक्त, गाय, भैंस, बकरी आदि से दूध, घी, मक्खन और चिड़ियों से अंडे प्राप्त होते हैं। पशुओं की खालों से अनेक प्रकार की वस्तुएँ बनाई जाती हैं। अनेक पशुओं से ऊन भी प्राप्त किया जाता है। चिड़ियों के पंखों से, शृंगारप्रसाधन के अतिरिक्त, अन्य प्रकार की वस्तुएँ भी बनाई जाती हैं। पशुओं की हड्डियों से सजावट के अनेक सुंदर सामान, बटन, खाद आदि तैयार होते हैं। कुत्ते, बिल्ली, खरगोश, गिनीपिग, सफेद चूहे और अनेक प्रकार की चिड़ियाँ मनोरंजर के लिए पाली जाती हैं।
पालतू प्राणियों की नस्लों में मनुष्य ने अनेक सुधार किए हैं। ये अपने पूर्वजों से बिल्कुल भिन्न मालूम पड़ने लगे हैं। इनमें कुछ आवश्यक गुणों का बहुत अधिक विकास किया गया है। कुछ नसलों के प्राणी तेज दौड़नेवाले, कुछ अधिक दूध देनेवाले, कुछ कठोर परिश्रम करनेवाले तथा कुछ उत्कृष्ट कोटि का ऊन उत्पन्न करनेवाले होते हैं। मनुष्य के पालतूकरण का ससे अधिक प्रभाव कुत्तों पर पड़ा। मनुष्य ने छोटे से छोटे कुत्ते - खिलौने कुत्ते, जिन्हें जेब में भी रखा जा सकता है - तथा बड़े से बड़े कुत्ते - सेंट बर्नाडं कुत्ते, जिनका भार एक स्वस्थ युवक के भार से भी अधिक होता है और चालाक से चालाक कुत्ते, जो वस्त्रों तथा अन्य वस्तुओं को सूँघकर अपने मालिक, चोरों आदि का पता लगा सकते हैं, पैदा किए हैं।

छद्मनगरीकरण

छद्मनगरीकरण


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जब किसी स्थान पर कोई बड़ा शहर बन जाता है किन्तु उस शहर की जनसंख्या के अनुरूप अधोसंरचना का विकास नहीं हो पाता तो इसे छद्मनगरीकरण (Pseudo-urbanization) या छद्म-शहरीकरण कहते हैं। छद्मनगरीकरण की स्थिति में नगर की जनसंख्या तो बढ़ जाती है किन्तु आवासशिक्षा, स्वच्छ जलयातायातविद्युत तथा सफाई आदि कि समुचित व्यवस्था का अभाव ही बना रह जाता है (जैसा कि गाँवों में होता है)। ऐसी स्थिति प्राय: विकाशशील या अविकसित देशों के नगरों में पायी जाती है।

चीन की सभ्यता

चीन की सभ्यता


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चीन की सभ्यता (चीनी: 中國文化) प्राचीनतम मानव सभ्यताओ मे से एक जो की ५ हजार से विद्यमान है एवं जटिल है। इस राष्ट्र की सान्स्क्रुतिक विविधता इस्की क्षेत्र के अनुसार विविध है। चीन मे कई समुदायो के लोग रह्ते है जिनमे से 'हान' की आबादी सर्वाधिक है। चीन मे अधिक्तर लोग नास्तिक है तथा कुछ बुध के अनुयायी है। मन्डारिन यहा की राष्ट्रिय भाषा है जो कि 'मिन्ग् सल्तनत' की है। पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर चीन में मानव बसाव लगभग साढ़े बाईस लाख (22.5 लाख) साल पुराना है। चीन की सभ्यता विश्व की पुरातनतम सभ्यताओं में से एक है। यह उन गिने-चुने सभ्यताओं में एक है जिन्होनें प्राचीन काल में अपना स्वतंत्र लेखन पद्धति का विकास किया। अन्य सभ्यताओं के नाम हैं - प्राचीन भारत (सिंधु घाटी सभ्यता), मेसोपोटामिया की सभ्यता, मिस्र सभ्यता और माया सभ्यता। चीनी लिपि अब भी चीन, जापान के साथ-साथ आंशिक रूप से कोरिया तथा वियतनाम में प्रयुक्त होती है।

कालीन

कालीन


कालीन
कालीन (अरबी : क़ालीन) अथवा गलीचा (फारसी : ग़लीच:) उस भारी बिछावन को कहते हैं जिसके ऊपरी पृष्ठ पर आधारणत: ऊन के छोटे-छोटे किंतु बहुत घने तंतु खड़े रहते हैं। इन तंतुओं को लगाने के लिए उनकी बुनाई की जाती है, या बाने में ऊनी सूत का फंदा डाल दिया जाता है, या आधारवाले कपड़े पर ऊनी सूत की सिलाई कर दी जाती है, या रासायनिक लेप द्वारा तंतु चिपका दिए जाते हैं। ऊन के बदले रेशम का भी प्रयोग कभी-कभी होता है परंतु ऐसे कालीन बहुत मँहगे पड़ते हैं और टिकाऊ भी कम होते हैं। कपास के सूत के भी कालीन बनते हैं, किंतु उनका उतना आदर नहीं होता। कालीन की पीठ के लिए सूत और पटसन (जूट) का उपयोग होता है। ऊन के तंतु में लचक का अमूल्य गुण होने से यह तंतु कालीनों के मुखपृष्ठ के लिए विशेष उपयोगी होता है। फलस्वरूप जूता पहनकर भी कालीन पर चलते रहने पर वह बहुत समय तक नए के समान बना रहता है।
ताने के लिए कपास की डोर का ही उपयोग किया जाता है, परंतु बाने के लिए सूत अथवा पटसन का। पटसन के उपयोग से कालीन भारी और कड़ा बनता है, जो उसका आवश्यक तथा प्रशंसनीय गुण है। अच्छे कालीनों में सूत की डोर के साथ पटसन का उपयोग किया जाता है।

    बनाने की विधि[संपादित करें]

    कालीन बुनने के पहले ही ऊन को रँग लिय जाता है। इसके लिए ऊन की लच्छियों को बाँस के डंडों में लटकाकर ऊन को रंग के गरम घोल में डाल दिया जाता है और रंग चढ़ जाने पर उन्हें निकाल लिया जाता है। आधुनिक रँगाई मशीन द्वारा होती है। कुछ मशीनों में रँगाई प्राय: हाथ की रँगाई के समान ही होती है, किंतु रंग के घोल को पानी की भाप द्वारा गरम किया जाता है और लच्छियाँ मशीन के चलने से चक्कर काटती जाती हैं। दूसरी मशीनों में ऊन का धागा बहुत बड़ी मात्रा में ठूँस दिया जाता है और गरम रंग का घोल समय-समय पर विपरीत दिशाओं में पंप द्वारा चलता रहता है। ऐसी मशीनें हाल में ही चली हैं। कालीन में प्रयुक्त होनेवाले ऊन के धागे की रँगाई तभी संतोषजनक होती है जब रंग प्रत्येक तंतु के भीतर बराबर मात्रा में प्रवेश करे। इसका अनुमान तंतु के बाहरी रंग से सदैव नहीं हो पाता और अच्छी रँगाई के लिए कुछ धागों की गुच्छी काटकर देख ली जाती है। अच्छे कालीन के लिए संतोषजनक रँगाई उतनी ही आवश्यक है जितनी पक्की और ठोस बुनाई। कीमती कालीनों के लिए पूर्णतया पक्के रंगों का उपयोग आवश्यक होता है। साधारण कालीनों के लिए रंग को प्रकाश के लिए तो अवश्य ही पक्का होना चाहिए और धुलाई के लिए जितना ही पक्का हो उतना ही अच्छा।
    ऊन के ऊपर प्राकृतिक चर्बी रहती है जिससे रंग भली भाँति नहीं चढ़ता। इसलिए ऊन को साबुन और गरम पानी में पहले धो लिया जाता है। साबुन के कुछ दुर्गुणों के कारण संकलित प्रक्षालकों (synthetic detergents) का प्रयोग अब ऊन की धुलाई में अधिक होने लगा है।

    हाथ से बुनाई[संपादित करें]

    बुनाई की विधि
    संसार भर में हाथ की बुनाई प्राय: एक ही रीति से होती है। ताने ऊर्ध्वाधर दिशा में तने रहते हैं। ऊपर वे एक बेलन पर लपेटे रहते हैं जो घूम सकता है। नीचे वे एक अन्य बेलन पर बँधे रहते हैं। जैसे-जैसे कालीन तैयार होता जाता है, वैसे-वैसे उसे नीचे के बेलन पर लपेटा जाता है, जैसा साधारण कपड़े की बुनाई में होता है। ताने के आधे तार (अर्थात डोरे) आगे पीछे हटाए जा सकते हैं और उनके बीच बाना डाला जाता है। इस प्रकार गलीचे की बुनाई उसी सिद्धांत पर होती है जिसपर साधारणत: कपड़े की होती है, परंतु एक बार बाना डालने के बाद ताने के तारों पर ऊन का टुकड़ा बाँध दिया जाता है। टुकड़ा काटकर बाँधना और लंबे धागे का एक सिरा बाँधकर काटना, दोनों प्रथाएँ प्रचलित हैं। बँधा हुआ टुकड़ा लगभग दो इंच लंबा होता है और अगल बगल के तारों में फंदे द्वारा फँसाया जाता है। फंदा डालने की दो रीतियाँ हैं। एक तुरकी और एक फारसी जो चित्र ३ से स्पष्ट हो जाएँगी। ऊन के फंदों की एक पंक्ति लग जाने के बाद बाने के दो तार (अर्थात्‌ डोरे) बुन दिए जाते हैं। तब फिर ऊन के फंदे बाँधे जाते हैं और बाने के तार डाले जाते हैं। प्रत्येक बार बाने के तार पड़ जाने के बाद लोहे के पंजे से ठोककर उनको बैठा दिया जाता है, जिससे कालीन की बुनाई गफ हो। बाना डालने की रीति में थोड़ा बहुत परिवर्तन हो सकता है जिससे कालीन के गुणों में कुछ परिवर्तन आ जाता है। आजकल साधारणत: कालीन बहुत चौड़े बुने जाते हैं। इसलिए इनको बुनते समय तानों के सामने कई एक कारीगर बैठते हैं और प्रत्येक लगभग दो फुट की चौड़ाई में ऊन के फंदे लगाता है। कारीगर अपने सामने आलेखन रखे रहते हैं और उसी के अनुसार रंगों का चुनाव करते हैं। फंदे लगाने की रीति से स्पष्ट है कि ऊन के गुच्छे कालीन के पृष्ठ से समकोंण पर नहीं उठे रहते, कुछ ढालू रहते हैं। हाथ के बुने कालीनों का यह विशेष लक्षण है
    कालीन बुने जाने के बाद ऊन के गुच्छे के छोरों को कैंची से काटकर ऊन की ऊँचाई बराबर कर दी जाती है। आवश्यकतानुसार तंतुओं को न्यूनाधिक ऊँचाई तक काटकर उभरे हुए। बेलबूटे आलेखन के अनुसार बनाए जा सकते हैं। ऐसे कालीनों में यद्यपि ऊन की हानि हो जाती है तथापि सुंदरता बढ़ जाती है और ये अधिक पसंद किए जाते हैं।
    कुछ कालीन दरी के समान, किंतु ऊनी बाने से, बुने जाते हैं। इनका प्रचलन कम है।
    हाथ से बने प्रथम श्रेणी के कालीन मशीन से बने कलीनों की अपेक्षा बहुत अच्छे होते हैं। हाथ से प्रत्येक कालीन विभिन्न आलेखन के अनुसार और विभिन्न नाप, मेल अथवा आकृति का बुना जा सकता है। ये सब सुविधाएँ मशीन से बने कालीनों में नहीं मिलतीं। कालीन में प्रति वर्ग इंच ऊन के ९ से लेकर ४०० तक गुच्छे डाले जा सकते हैं। साधारणत: २०-२५ गुच्छे रहते हैं। भारत, ईरान, मिस्र, तुर्की और चीन हाथ के बने कालीनों के लिए प्रसिद्ध हैं। भारत में मिर्जापुर, भदोही (वाराणसी), कश्मीर, मसूलीपट्टम आदि स्थान कालीनों के लिए विख्यात हैं और इन सब कालीनों में फारसी गाँठ का ही प्रयोग किया जाता है।

    मशीन से कालीन की बुनाई[संपादित करें]

    Bundesarchiv Bild 183-1985-0615-017, VEB Teppichwerk Nord Malchow, Karin Hipke.jpg
    मशीन की बुनाई कई प्रकार की होती है। सबसे प्राचीन ब्रुसेल्स कालीन है। इसमें कालीन के पृष्ठ पर ऊन के धागों का कटा सिरा नहीं रहता, दोहरा हुआ धागा रहता है। बुनावट ऐसी होती हैं कि यदि ऊन पर्याप्त पुष्ट हो तो एक सिरा खींचने पर एक पंक्ति का सारा ऊन एक समूचे टुकड़े में खिंच जाएगा। फिर कई रंगों का आलेखन रहने पर कई रंगों के ऊन का उपयोग किया जाता है और जहाँ आलेखन में किसी रंग का अभाव रहता है वहाँ उन रंगों के धागे कालीन की बुनावट में दबे रहते हैं। केवल उसी रंग के धागे के फंदे बनते हैं जो कालीन के पृष्ठ पर दिखलाई पड़ते हैं। इन कारणों से पाँच से अधिक रंगों का उपयोग एक ही कालीन में कठिन हो जाता है। बारंबार एक ही प्रकार के बेलबूटे डालने के लिए छेद की हुई दफ्तियों का प्रयोग किया जाता है, जैसे सूती कपड़े में बेलबूटे बनाते समय।
    ऊन का सिरा कटा न रहने के कारण ये कालीन बहुत अच्छे नहीं लगते। ऊनी धागों का अधिकांश बुनाई के बीच दबा रहता है। इस प्रकार भार बढ़ाने के अतिरिक्त वह किसी काम नहीं आता और कालीन का मूल्य बेकार बढ़ जाता है। इन कालीनों का प्रचलन अब बहुत कम हो गया है।

    विल्टन कालीन[संपादित करें]

    विल्टन कालीन की प्रारंभिक बुनावट वैसी ही होती है जैसी ब्रुसेल्स कालीन की, परंतु बुनते समय ऊन के फंदों के बीच धातु का तार डाल दिया जाता है जिसका सिरा चिपटा और धारदार होता है। जब इस तार को खींचा जाता है तब ऊन के फंदे कट जाते हैं और पृष्ठ वैसा ही मखमली हो जाता है जैसा हाथ से बुने कालीन का होता है। मखमली पृष्ठ देखने में सुंदर और स्पर्श करने में बहुत कोमल होता है। तार खींचने का काम स्वयं मशीन बराबर करती रहती है।
    विल्टन कालीन में ऊनी मखमली पृष्ठ के गुच्छे ब्रुसेल्स कालीन के दोहरे धागे की अपेक्षा अधिक दृढ़ता से बुनाई में फँसे रहते हैं। ये कालीन बहुधा ब्रुसेल्स की अपेक्षा घने बुने जाते हैं और इनमें तौल बढ़ाने का प्रयत्न नहीं किया जाता। कोमलता और कारीगरी के कारण मूल्य अधिक होने पर भी ये कालीन पसंद किए जाते हैं। सस्ते कालीनों की खपत अधिक होने के कारण सस्ते ऊनी विल्टन बनने लगे, जिनमें सस्ते ऊनी धागे का उपयोग होता है। एकरंगे विल्टन सबसे सस्ते पड़ते हैं और उन लोगों को, जो एकरंगा कालीन पसंद करते हैं, ये कालीन बहुत अच्छे लगते हैं।
    चौड़े विल्टन कालीन बनाने में तारवाली रीति से असुविधा होती है। इसलिए फंदे बनाने और उनको काटने में धातु के तार की जगह धातु के अंकुशों का उपयोग होने लगा है।

    एक्समिन्स्टर कालीन[संपादित करें]

    मशीन से बने कालीनों में यद्यपि ये कालीन (टफ़्टेड को छोड़कर) सबसे नए हैं, तथापि बुनावट में ये पूर्वदेशीय (ईरान, भारत, चीन इत्यादि के) कालीनों के बहुत समीप हैं। समानता इस बात में है कि ये ऊन के धागों के गुच्छों से बने होते हैं, यद्यपि गुच्छे मशीन द्वारा डाले जाते हैं और उनमें गाँठें नहीं पड़ी रहतीं। एक्समिन्स्टर कालीन की विशेषता यह है कि गुच्छे खड़ी पंक्तियों में ताने के बीच डाले जाते हैं। ये डालने से पहले या बाद में काटे जाते हैं और बाने से बुनावट में कसे रहते हैं। प्रत्येक गुच्छा कालीन की सतह पर दिखाई पड़ता है और आलेखन का अंग रहता है। गुच्छों का कोई भी भाग ब्रुसेल्स और विल्टन कालीनों की तरह छिपा नहीं रहता और इस प्रकार व्यर्थ नहीं जाता। फंदे का कम से कम भाग बाने से दबा रहता है।
    इंग्लैंड में इनके बुनने की कला १९वीं शताब्दी के अंत में अमरीका से आई और तब से दिनों दिन इसका विकास होता गया। इस कालीन की बुनावट में खर्च कम पड़ता है और सामान (ऊनी, सूती, पटसनी धागा) भी कम लगता है। बुनावट विशेष सघन सुंदर जान पड़ती है और ऐसे कालीनों के बनाने में असंख्य आलेखनों और रंगों के समावेश की संभावना रहती है। अन्य कालीनों के समान इनमें भी कई मेल होते हैं, परंतु बुनावट में विशेष भेद नहीं होता। भेद केवल गुच्छों के तंतुओं की अच्छाई, सघनता और उनको फँसाने की विधि में होता है।
    एक्समिन्स्टर कालीनों की बनावट चित्र ८ में प्रदर्शित की गई है। अलग-अलग कंपनियों के कालीनों में थोड़ा बहुत भेद होते हुए भी साधारणतया दोहरे लिनेन का या सूती ताना, सूती भराऊ बाना और पटसन का दोहरा बाना प्रयुक्त किया जाता है।

    आधुनिक मशीनें[संपादित करें]

    पहले मशीन से बने कालीन बहुत चौड़े नहीं होते थे। चौड़े कालीनों के लिए दो या अधिक पट्टियों को जोड़ना पड़ता था, किंतु अब बहुत चौड़े कालीन भी मशीन पर बुने जा सकते हैं। प्राय: सब प्राचीन आलेखनों की प्रतिलिपि बनाई जा सकती है और इस प्रकार समय-समय पर कभी एक, कभी दूसरा आलेखन फैशन में आता रहता है।
    इसके अतिरिक्त कालीन बनाने की मशीन, कालीन की बनावट और धागों को रँगने की विधि में दिनोंदिन उन्नति हो रही है। नियत समय में अधिक से अधिक माल तैयार करना और कम से कम श्रम के साथ तैयार करना, यही ध्येय रहता है।
    द्वितीय विश्वयुद्ध के कुछ बाद ही संयुक्त राष्ट्र (अमरीका) के दक्षिणी भाग में सिलाई द्वारा कालीन बनाने की मशीन का आविष्कार हुआ। इनसे "गुच्छित' कालीन बनते हैं। दिन प्रति दिन गुच्छित कालीनों की मशीनों में उन्नति हो रही है। इस समय अमरीका के बाजार में ये कालीन बहुत बड़ी मात्रा में बिकते हैं। गुच्छित कालीनों की मशीनों की माल तैयार करने की क्षमता बहुत अधिक होती है और मशीन लगाने का प्रारंभिक खर्च अधिक होते हुए भी सस्ते कालीन तैयार होते हैं।
    इन कालीनों के मुखपृष्ठ और पीठ को एक साथ नहीं बनाया जाता। मुखपृष्ठ के फंदे या तो सिलाई द्वारा पहले से बनी हुई पीठ पर टाँक दिए जाते हैं या गुच्छे रासायनिक लेप द्वारा पीठ के कपड़े पर चिपका दिए जाते हैं। द्वितीय विधि में तप्त करने की कुछ क्रिया के अनंतर चिपकानेवाला पदार्थ पक्का हो जाता है और गुच्छे दृढ़ता से पीठ पर चिपक जाते हैं। ऊन के फंदों के दोनों ओर एक-एक पीठ चिपकाकर और फंदों को बीचोबीच काटकर एक ही समय में दो कालीन भी तैयार किए जा सकते हैं।
    कालीन बनते समय ही आलेखनों का बन जाना, या कालीन बन जाने के बाद मुखपृष्ठ का रँगा जाना, या छपाई द्वारा आलेखन उत्पन्न करना, इन सब दिशाओं में भी गुच्छित कालीनों में बहुत प्रगति हुई है।

    कालीन की गुणवत्ता[संपादित करें]

    ऊपर कई वर्गो के कालीनों का वर्णन किया गया है। किसी भी वर्ग के कालीन के विषय में यदि कोई अकेला शब्द है जिससे उसके संपूर्ण गुण, दोष, श्रेणी और मूल्य का ज्ञान होता है तो वह कालीन की क्वालिटी है। क्वालिटी प्रधानत: कालीन के मुखपृष्ठ पर ऊनी गुच्छों के घनेपन पर निर्भर रहती है। इस प्रकार ऊँची क्वालिटी, मध्य क्वालिटी, नीची क्वालिटी, कालीन के व्यापार में साधारण शब्द हैं। घने बुने हुए कालीन के लिए साधारणतया बढ़िया और लंबी ऊन का पतला धाग आवश्यक होता है। कीमती ऊन के अधिक मात्रा में लगने के साथ उच्च श्रेणी का ताना बाना आवश्यक होता है। बढ़िया पतले धागे के उपयोग और गाँठों के पास-पास होने से कालीन तैयार होने में समय अधिक लगता है। इस प्रकार ऊँची क्वालिटी के कालीन का मूल्य अधिक होता है।
    कालीन की क्वालिटी एक वर्ग इंच में गाँठों की संख्या से प्रदर्शित की जाती है। यद्यपि यह प्रथा तब तक संतोषजनक नहीं होती जब तक यह भी निश्चय न कर लिया जाए कि गाँठें इकहरे धागे से डाली गई हैं या दोहरे अथवा तिहरे धागे से। उदाहरणत:, तिहरे धागे से बना कालीन दोहरे धागे से बने कालीन की अपेक्षा, प्रति वर्ग इंच कम गाँठों का होने पर भी, घना हो सकता है।

    बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

    जयपुर में कालीन विक्रेता

    कार्दाशेव मापनी

    कार्दाशेव मापनी


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    कार्दाशेव मापनी (Kardashev scale) किसी सभ्यता के प्रौद्योगिकीय विकास के स्तर को मापने की एक विधि है। इसमें सभ्यता द्वारा संचार के लिये उपयोग में ली जाने वाली ऊर्जा को आधार के रूप में लिया जाता है। इस आधार पर सभ्यताओं की तीन श्रेणीया बतायी गयी हैं- श्रेणी-१, श्रेणी-२ तथा श्रेणी-३। 1964 मे कार्दाशेव ने किसी परग्रही सभ्यता के तकनीकी विकास की क्षमता को मापने के लिये इस मापनी को प्रस्तावित किया।
    रूसी खगोल विज्ञानी निकोलाइ कार्दाशेव के अनुसार सभ्यता के विकास के विभिन्न चरणो को ऊर्जा की खपत के अनुसार श्रेणीबद्ध लिया जा सकता है। इन चरणो के आधार पर परग्रही सभ्यताओं का वर्गीकरण किया जा सकता है।

    ईजियाई सभ्यता

    ईजियाई सभ्यता


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    जो सभ्यता 12वीं सदी ई.पू. से पहले दोरियाई ग्रीकों के ग्रीस पर आक्रमण के पूर्व क्रीत और निकटवर्ती द्वीपों, ग्रीस की सागरवर्ती भूमि, उसके मिकीनी केंद्रीय प्रांतों तथा इतिहासप्रसिद्ध त्राय में विकसित हुई और फैली, उसे पुराविदों ने 'ईजियाई सभ्यता' (Aegean civilizations) नाम दिया है। पुरातात्विक अनुसंधानों और खुदाइयों से क्रीत, मिकीनी और लघुएशिया के त्राय नगर में जिन खंडहरों के दर्शन हुए हैं वे मिस्री, सुमेरी और सैंधव सभ्यता के समकालीन माने जाते हैं। वहाँ की सभ्यता उन्हीं सभ्यताओं की भाँति कांस्ययुगीन थी, लौहयुग की पूर्ववर्ती। इन सभी स्थानों में प्रासादों और भवनों के खंडहर मिले हैं। क्रीतीय सभ्यता का प्राचीनतम केंद्र और उस राज्य की राजधानी ग्रीस के दक्षिण के उस द्वीप के उत्तरी तट पर बसा क्नोसस था। क्नोसस के राजमहल के भग्नावशेष से प्रगट है कि उसमें समृद्धि का निवास था और उसमें भव्य भित्तिचित्रों से अलंकृत बड़े बड़े हाल और ऊपरी मंजिलों में जाने के लिए चक्करदार सोपानमार्ग (जीने) थे। स्नानागारों और अन्य कमरों में नल लगे थे जिनमें निरंतर जल प्रवाहित होता रहता था। यह सभ्यता अपने मिनोस उपाधिधारी राजाओं के नाम से 'मिनोई' या मिकीनी नगर से संबंधित होने के कारण मिकीनी भी कहलाती है।

    आरम्भ[संपादित करें]

    ईजियाई सभ्यता का आरंभ ई.पू. तृतीय सहस्राब्दी के आरंभ से संभवत: कुछ पूर्व ही हो चुका था और उसका अंत ई. पू. द्वितीय सहस्राब्दी के मध्य के लगभग हुआ। वैसे तो उस सभ्यता का आधार स्थानीय प्रस्तरयुगीन सभ्यता है, पर पुराविदों का अनुमान है कि उसके निर्माताओं का रक्त और भाषा का संबंध एक ओर तो पश्चिमी बास्कों से था, दूसरी ओर बर्बरों और प्राचीन मिस्रियों से। उनके मिस्रियों सरीखे कटिवसन तथा शेष भाग की नग्नता से पंड़ितों का अनुमान है कि वे संभवत: मिस्र से ही जाकर क्रीत द्वीप में बस गए थे। चित्राक्षरों में लिखे भ्रांत मिस्री नाविक के वृत्तांत से भी इस अनुमान की आंशिक पुष्टि होती है। क्रीत के उन प्राचीन निवासियों का उत्तर की यूरोपीय श्वेत जातियों से किसी प्रकार का रक्तसंबंध परिलक्षित नहीं होता। पहले ईजियाइयों ने शुद्ध धातु, ताँबे, आदि का उपयोग किया, फिर मिश्रित धातु काँसे का, जो ताँबे और टिन के मिश्रण से बनता था। यह टिन भारत से जाता था जहाँ उसके संस्कृत नाम 'बंग' से बंगाल प्रसिद्ध हुआ। वहीं से यह मिश्रित काँसा बाबुल और मिस्र भी गया था। ईजियाई सभ्यता में लिपि का भी प्रयोग होता था पर भारतीय सैंधव लिपि की ही भाँति वह भी अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है। वह पढ़ ली जाए तो उस सभ्यता का और भी गहरा रहस्य खुले।
    इस सभ्यता के प्रकाशन का श्रेय पुरातात्विक विज्ञान के जनक श्लीमान और सर आर्थर ईवांस को है। श्लीमान ने होमर के महाकाव्य 'ईलियद' में वर्णित त्राय को खोद निकाला और उसके बाद ईवांस ने क्नोसस को खोदकर मिनोस के राजमहलों का उद्धार किया। सर आर्थर ने ईजियाई सभ्यता को नौ स्तरों में विभाजित किया है--प्राचीन मिनोई युग, मध्य मिनोई युग, उत्तर मिनोई युग। फिर उनमें से प्रत्येक के अपने अपने तीन तीन-प्रथम, द्वितीय और तृतीय -युग हैं। मिस्री सभ्यता के स्तरों से मिलान करके इस सभ्यता के युगों की उनसे समसामयिकता और भी पुष्ट कर ली गई है। लगता है, 1400 ई. पू. के लगभग इस महान्‌ और समृद्ध नागरिक सभ्यता का अंत हुआ जब ऐशियाई ग्रीकों के भीषण आक्रमणों और भूचाल ने मिलकर उसे मिटा दिया।
    प्राचीन और मध्य मिनोई युगों में धातुओं का उपयोग प्रभूत मात्रा में हुआ। काँसे और ताँबे की ही कटारें और तलवारें बनती थीं। जीवन ऊँचे स्तर का था और बर्तन बनाने के लिए मिट्टी की जगह धातुएँ काम में लाई जाने लगी थीं। सोने और चाँदी के बर्तन भी खुदाइयों में मिले हैं। मिट्टी के बर्तन बनते अवश्य थे, परंतु उनकी काया अधिकतर धातु के बर्तनों की नकल में ही सिरजी जाती थी। मिट्टी के बर्तनों की कला स्वयं ऊँचे दर्जे की थी। ईजियाई द्वीपों में क्रीत ने सबसे पहले भांडों को चित्रित करना शुरू किया। दूसरी विशिष्ट प्रगति मिनोई युग के प्रथम चरण में हुई जिसमें विभिन्न प्रकार के भांड-भांडे बनने लगे। सुराहियाँ टोंटीदार या चोंचनुमा बनने लगीं, फिर उनमें अत्यंत आकर्षक दमखम दिए जाने लगे। फिर तो अगले प्राचीन युग में घुमावदार भांड़ों की बाढ़ सी आ गई।
    यही युग त्राय नगर की दूसरी बस्ती का था, द्वितीय त्राय का। श्लीमान ने छह छह त्राय एक के नीचे एक लघुएशिया में खोद निकाले हैं। प्राचीन मिनोई सभ्यता के तृतीय चरण के समानांतर प्रमाण त्राय की खुदाइयों में मिले हैं। वहाँ भी बहुमूल्य धातुओं की बनी वस्तुएँ-सोने की पिन और जंजीरें, सोने चाँदी के बर्तन मिले हैं जिससे उन्हें पुराविदों ने 'प्रियम का खजाना' नाम उचित ही दिया है। वहाँ के बर्तनों में प्रधान काले रंग के और उलूकशीर्ष हैं। इसी प्रकार क्रीत और त्राय के नीचे के द्वीपों में भी उसी सभ्यता के बिखरे हुए चिह्न, कलात्मक बर्तन आदि मिले हैं। वहाँ भी शवसमाधियों की शैली प्रधान सभ्यता के अनुरूप है। क्रीती और इन द्वीपों की शवसमाधियों में दफनाई मूर्तियों की शैली प्राय: वही है जो मिस्री कब्रों की मूर्तियों की है।
    प्राचीन मिनोई युग के अंतिम चरण की विशेषता पत्थर की कोरकर बनाई वस्तुओं में है। पत्थर में कढ़े हुए फूल और समुद्री जीवों के अभिप्राय तब की कला में विशेष प्रयुक्त हुए। इनके निर्माण में प्रधानत: संगमरमर या चूना मिट्टी का उपयोग हुआ है। जहाँ तक धातु के बर्तनों का प्रश्न है, लगता है, त्राय के सुनारों ने बाबुली धातुकर्म की नकल की थी। वही डिजाइनें बाद में पत्थर और मिट्टी के बर्तनों पर बनीं। मिस्र ने भी इसी शैली का कालांतर में उपयोग किया। बर्तनों का इतना आकर्षक निर्माण उस प्राचीन काल के दो आविष्कारों का विस्मयकारक परिणाम था। भांड कला के इतिहास में निश्चय उन आविष्कारों का असाधारण महत्व है। ये थे कुम्हार के आवाँ (भट्ठी) और चक्के या पहिए के आविष्कार। संभवत: इसका आविष्कार पूरब में हुआ, एलाम में, या भारत की सिंधु घाटी में, या दोनों में, शायद 4,000 ई.पू. से भी पहले। क्रीत और त्राय के जीवन में संभवत:उनका आयात प्राचीन मिनोई युग के अंतिम चरण में हुआ। चित्रलिपि से कुछ मिलती लिखावट क्रीत के ठीकरों पर खुदी हुई है। गीली मिट्टी में लिखावट प्राय: वैसे ही संपन्न हुई है जैसे बाबुल और सुमेर में हुआ करती थी, परंतु उनके तौर तेवर मिस्री लिखावट से मिलते जुलते हैं। अभी तक यह लिखावट पढ़ी नहीं जा सकी। वास्तु का आरंभ हो गया था। क्नोसस के महलों के पूर्ववर्ती पत्थर के मकानों के खंडहर उसी युग के हैं।

    मिनोस राजाओं का राज्य[संपादित करें]

    मिनोई राजाओं की राजधानी क्रीत के उत्तरी तट पर बसे क्नोसस में थी। मध्य मिनोई युग में मिनोस राजाओं ने प्राय: समूचे क्रीत और निकटवर्ती द्वीपों पर अधिकार कर लिया। फाइस्तस और आगिया त्रियादा के महल भी क्नोसस के राजाओं के ही बनवाए माने जाते हैं। लोकपरंपराओं और अनुश्रुतियों में फाइस्तस का वर्णन उपनिवेश के रूप में हुआ है।
    क्नोसस के राजप्रासाद का निर्माण नवप्रस्तरयुगीन भग्नावशेषों के ऊपर हुआ है। क्नोसस के प्रासादों के भग्नावशेष क्रीत के उत्तरी तट पर कांदिया के आधुनिक नगर के निकट ही हैं। वहाँ के पश्चिमी प्रवेशद्वार की विशालता और फाइस्तस के गैलरीनुमा रंगप्रांगण, जो पत्थर के बने हैं, वास्तुकला की प्रगति में उस प्राचीन काल में एक आदर्श प्रस्तुत करते हैं। क्नोसस के उत्तरी और फाइस्तस के दक्षिणी राजमहल प्राय: एक ही समय बने थे। क्रीत के दक्षिणी तट पर फाइस्तस के महलों के खंडहर हैं और उनके पास ही आगिया त्रियादा के राजप्रासाद के भग्नावशेष भी हैं, यद्यपि वे बने उत्तर-मिनोई-युग में थे।
    लगता है, क्नोसस के महल युगों तक बनते और आवश्यकतानुसार बदलते चले आए थे। राजाओं की बढ़ती हुई समृद्धि, कला की प्रगति और सुरुचि के परिष्कार के अनुकूल समय समय पर उनमें परिवर्तन होते गए। इस प्रकार के परिवर्तन कुछ मध्ययुग में भी हुए थे, परंतु पिछले युग में तो इन महलों के रूप ही बदल डाले गए। जिस रूप में उनके खंडहर आज पुराविदों के प्रयत्नों से प्रस्तुत हुए हैं उनसे प्रगट है कि इन महलों में असाधारण बड़े बड़े हाल थे, घुमावदार सोपानमार्ग थे, ढलान पर उतरनेवाले लंबे कक्ष थे और बाहरी प्रासाद से संलग्न भवन थे-और फिर दूर, क्रीती सभ्यता का नागरिक विस्तार पश्चिम के पर्वतों के ऊपर तक चला गया था। प्रधान राजप्रासाद अपनी उच्चस्तरीय जीवनसुविधाओं के साथ अत्यंत आधुनिक लगता है। उन सुविधाओं का एक प्रधान अंग उनकी गंदे जल की नालियाँ हैं। मिस्री फराऊनों और पेरिक्लीज़कालीन एथेंस के कोई मकान उसके जोड़ के न थे। हाँ, यदि प्रासादनिर्माण की शालीनता में इसका कोई पराभव कर सकता है तो वे निनेवे के असुरबनिपाल के सचित्र प्रासाद हैं। फिर भी दोनों में काफी अंतर है। जहाँ असुरबनिपाल के महल सूने हैं और ठंडे तथा जाड़ों के लिए असुविधाजनक लगते हैं वहाँ मिनोई राजप्रासाद गरम और आरामदेह हैं और उनकी चित्रित दीवारों से लगता है कि उनमें भरापूरा जीवन लहरें मारता था। उनके भित्तिचित्रों से प्रगट है कि क्नोसस के महलों के भीतर राजा का दरबार भरा रहता था और उसमें नर और नारी परिचारकों की संख्या बड़ी थी। राजा और उसके दरबारी सभी प्रसन्न और जीवन को निर्बध भोगते हुए चित्रित हुए हैं। चित्रों की आकृतियाँ अनेक बार कठोर और निश्छंद रूढ़िगत सी हो गई हैं, कुछ भोंडी भी हैं, परंतु उनकी रेखाएँ बड़ी सबल हैं। उनके खाके निश्चय असाधारण कलावंतों ने खींचे होंगे। भित्तिचित्रों से प्रमाणित है कि दरबार के आमोदप्रमोदों में नारियाँ उसी स्वच्छंदता से भाग लेती थीं जैसे पुरुष। नर और नारी दोनों समान अधिकार से सामाजिक जीवन में भाग लेते थे और प्रतीत तो ऐसा होता है कि राजमहल और समाज के जीवन में नारी का ही प्रभुत्व अधिक था। इसमें संदेह नहीं कि उस प्राचीन जगत्‌ में क्रीत की सभ्यता ने जितने अधिकार नारी को दिए, पुरुष का समवर्ती जो स्थान उसे दिया वह तब के जीवन में कहीं और संभव न था।
    भित्तिचित्रों में नारी की त्वचा श्वेत और पुरुष की रक्तिम चित्रित हुई है, प्राय: मिस्री रीति के अनुसार। दरबारी दाढ़ी मूँछ मुड़ाकर चेहरे साफ रखते थे और केश लंबे, जिन्हें वे नारियों की ही भाँति वेणियों में सजा लेते थे। अनेक बार तो साँड़ों की लड़ाई देखते लड़कों में लड़कियों का पहचानना कठिन हो जाता है और यदि उनकी त्वचा रूढ़िगत रंगों से स्पष्ट न कर दी गई होती तो दोनों का दर्शन नितांत समान होता। नारियों में परदा न था, यह तो उस काल के चित्रित दृश्यों से अनुमित हो ही जाता है, वैसे भी खिड़कियों में बिना घूँघट के बैठी नारियों की आकृतियों से उनकी इस अनवगुंठित स्थिति का प्रकाश होता है। नारियाँ गर्दन और बाहुओं को निरावृत्त रखती थीं, हारों से ढक लेती थीं, वस्त्र कटि पर कस लेती थीं और नीचे अपने घाघरे की चूनटें की चूनटें आकर्षक रूप से पैरों पर गिरा लेती थीं। पिछले युग के चित्रों में नारियाँ, कम से कम राजमहल की, मस्तक पर किरीट भी पहने हुए हैं। पुरुषों का वेश उनसे भिन्न था, अत्यंत साधारण। वे कटि से नीचे जाँघिया पहनते थे, अनेक बार मिस्री चित्रों के पुरुषों की घुटनों तक पहुँचानेवाली तहमत की तरह, किंतु रंगों के प्रयोग से चमत्कृत। मिस्री पुरुषों की भाँति उनके शरीर का ऊर्ध्वार्ध नंगा रहता था और जब तब वे कोनदार टोपी पहनते थे। पुरुषों के केश वेणीबद्ध या खुले ही कमर तक लटकते थे या जब तब वे उनमें गाँठ लगा सिर के ऊपर बाँध लेते थे। क्नोसस के पुरुष भी पिछले युग के खत्तियों की भाँति पैरों में ऊँची सैंडिल या बूट पहनते थे। मिनोई सभ्यता की नरनारियों का रंगरूप प्राय: आज के इटलीवालों का सा था। उनके नेत्र और केश काले थे, नारियों का रंग संभवत: धूमिलश्वेत और पुरुषों का चटख ताम्र।
    जीवन सुखी, आमोदमय और प्रसन्न था। लोग नर-पशु-युद्ध देखते और उनमें भाग लेते थे। परंतु उनके पास संभवत: रक्षा के साधन कम थे, कम से कम कवच खुदाइयों में नहीं मिला है। तलवार का उपयोग वे निश्चय करते थे।
    आमोद के जीवन में स्वाभाविक ही धर्म की कठोर रूढ़ियाँ समाज को आतंकित नहीं कर पातीं और मिनोई समाज में भी उनका अभाव था। परंतु उनके देवता थे, यद्यपि उनको स्पष्टत: पहचान पाना कठिन है। फिर भी यह स्पष्टत: कहा जा सकता है कि लोगों का विश्वास वृक्षों, चट्टानों, नदियों आदि से संबंधित देवताओं में था और कम से कम एक विशिष्ट सर्पदेवी की मातृपूजा वे अवश्य करते थे। इस प्रकार की मातृदेवी की आकृतियाँ जो सर्प धारण करती हैं वहाँ चित्रित मिली हैं।
    महलों के भित्तिचित्रों से तो प्रगट ही है कि चित्रकला विशेष रूप से कलावंतों द्वारा विकसित हुई थी और उनमें रंगों का प्राधान्य एक तकनीक का आभास भी देता है। पत्थर को कोरकर मूर्ति बनाने अथवा उसकी पृष्ठभूमि से उभारकर दृश्य लिखने की कला ने नि:संदेह एशियाई देशों के अनुपात में प्रश्रय नहीं पाया था और उनकी उपलब्धि अत्यंत न्यून संख्या में हुई है। आगिया त्रियादा से मिले कुछ उत्कीर्ण दृश्य निश्चय ऐसे हैं जिनकी प्रशंसा किए बिना आज का कलापारखी भी न रह सकेगा।

    अंतिम युग[संपादित करें]

    पिछले युगों में ईजियाई सभ्यता के निर्माताओं ने राजनीतिक दृष्टि से अनेक सफल प्रयत्न किए। आसपास के समुद्रों और द्वीपों पर उन्होंने अपना साम्राज्य फैलाया और प्रमाणत: उनका वह साम्राज्य ग्रीस और लघुएशिया (अनातोलिया) पर भी फैला जहाँ उन्होंने मिकीनी, त्राय आदि नगरों के चतुर्दिक अपने उपनिवेश बनाए। परंतु संभवत: साम्राज्यनिर्माण उनके बूते का न था और उन्होंने उस प्रयत्न में अपने आपको ही नष्ट कर दिया। यह सही है कि ग्रीस के स्थल भाग पर उनका अधिकार हो जाने से उनकी आय बढ़ गई पर उपनिवेशों की सँभाल स्वयं बड़े श्रम का कार्य था, जिसका निर्वाह कर सकना उनके लिए संभव न हुआ। परिणामत: जब बाहर से आक्रमणकारी आए तब आमोदप्रिय मिनोई नागरिक उनकी चोटों का सफल उत्तर न दे सके और उन्हें आत्मसमर्पण करना पड़ा। परंतु विजेताओं को यह निष्क्रिय आत्मसमर्पण स्वीकार न था और उन्होंने उसे नष्ट करके ही दम लिया।
    यह कहना कठिन है कि ये आक्रमणकारी कौन थे। इस संबंध में विद्वानों के अनेक मत हैं। कुछ उन्हें मूल ग्रीक मानते हैं, कुछ एशियाई, कुछ दोरियाई, कुछ खत्ती, कुछ अनातोलिया के निवासी। पंरतु प्राय: सभी, कम से कम आंशिक रूप में, यह मानते हैं कि आक्रांता आर्य जाति के थे और संभवत: उत्तर से आए थे जो अपने मिनोई शत्रुओं को नष्ट कर उनकी ही बस्तियों में बस गए। नाश के कार्य में वे प्रधानत: प्रवीण थे क्योंकि उन्होंने एक ईटं दूसरी ईटं पर न रहने दी। आक्रांता धारावत्‌ एक के बाद एक आते गए और ग्रीक नगरों को ध्वस्त करते गए। फिर उन्होंने सागर लाँघ क्रीत के समृद्ध राजमहलों को लूटा जिनके ऐश्वर्य के कुछ प्रमाण उन्होंने उनके स्थलवर्ती उपनिवेशों में ही पा लिए थे। और इन्होंने वहाँ के आकर्षक जनप्रिय मुदित जीवन का अंत कर डाला। क्नोसस और फ़ाइस्तस के महलों में सदियों से समृद्धि संचित होती आई थी, रुचि की वस्तुएँ एकत्र होती आई थीं, उन सबको, आधार और आधेय के साथ, उन बर्बर आक्रांताओं ने अग्नि की लपटों में डाल भस्मसात्‌ कर दिया। सहस्राब्दियों क्रीत की वह ईजियाई सभ्यता समाधिस्थ पड़ी रही, जब तक 19वीं सदी में आर्थर ईवांस ने खोदकर उसे जगा न दिया।

    होमरिक काव्य[संपादित करें]

    होमर ने अपने ईलियद में जिस त्राय के युद्ध की कथा अमर कर दी है वह त्राय उसी मिनोई ईजियाई सभ्यता का एक उपनिवेश था, राजा प्रियम्‌ की राजधानी, जिसके राजकुमार पेरिस ने ईजियाई सभ्यता को नष्ट करनेवाले एकियाई वीरों में प्रधान अगामेम्नन के भाई मेनेलाउ की भार्या हेलेन को हर लिया था। होमर की उस कथा का लघुएशिया के उस ईजियाई उपनिवेश त्राय की नगरी के विध्वंस से सीधा संबंध है और उसकी ओर संकेत कर देना यहाँ अनुचित न होगा। उस त्राय नगरी को श्लीमान ने खोद निकाला है, एक के ऊपर एक बसी त्राय की छह नगरियों के भग्नावशेषों को, जिनमें से कम से कम सबसे निचली दो होमर की कथा की त्राय नगरी से पूर्व के हैं।
    महाकवि होमर स्वयं संभवत: ई.पू. 9वीं सदी में हुआ था। उसके समय में अनंत एकियाई वीरगाथाएँ जातियों और जनों में प्रचलित थीं जिनको एकत्र कर एकरूपीय श्रृंखला में अपने मधुर गेय भावस्रोत के सहारे होमर ने बाँधा। ये गाथाएँ कम से कम तीन चार सौ वर्ष पुरानी तो उसके समय तक हो ही चुकी थीं। इन्हीं गाथाओं में संभवत: एकियाई जातियों का ग्रीस के ईजियाई उपनिवशों और स्वयं क्रीत के नगरों पर आक्रमण वर्णित था जिसका लाभ होमर को हुआ। कुछ आश्चर्य नहीं जो एकियाई जातियों ने ही ईजियाई सभ्यता का विनाश किया हो। परंतु एकियाई जातियों के बाद भी लगातार उत्तर से आनेवाली आर्य ग्रीक जातियों के आक्रमण ग्रीस पर होते रहे। उन जातियों में विशिष्ट दोरियाई जाति थी जिसने संभवत: 12वीं सदी ई.पू. में समूचे ग्रीस को लौहायुधों द्वारा जीत लिया और सभ्यता की उस प्राचीन भूमि पर, प्राचीन नगरों के भग्नावशेषों के आसपास और उसी प्रकार क्वाँरी भूमि पर भी, उनके नगर बसे जो प्राचीन ग्रीस के नगरराज्यों के रूप में प्रसिद्ध हुए और जिन्होंने पेरिक्लीज़ और सुकरात के संसार का निर्माण किया।

    इन्का सभ्यता

    इन्का सभ्यता


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    इन्का सभ्यता यह प्राचीन दक्षिणी अमेरिका की समृद्ध सभ्यता थी। इसका अन्तिम प्रभुसत्ताक सम्राट अटाहुआल्पा था, जिसके स्पेनी पिज़्ज़ारो ने बन्दी बनाया और फिर उसे प्राणदण्ड दिया।

    बाह्य[संपादित करें]

    इन्का विस्तार (1438-1527)

    आर्य-आक्रमण के सिद्धांत में समय के साथ परिवर्तन

    आर्य-आक्रमण के सिद्धांत में समय के साथ परिवर्तन[संपादित करें]

    आर्य आक्रमण का सिद्धांत अपने आराम्भिक दिनों से ही लगातार परिवर्तित होते रहा है। आर्य-आक्रमण के सिद्धांत कि अधुनिक्तम परिकल्पन के अनुसार यह कोइ जाति विशेष नहीं थी अपितु यह केवल एक सम्मानजनक शब्द था जो कि आन्ग्ल्भाषा के SIR के समनर्थाक था। आर्यो के आक्रमन की कल्पान के समर्थन के सभी तथ्य भ्रमक सिद्ध हो चुके है।
    सन्दर्भ - आर्य कौन थे - लेखक - श्री राम साठे अनुवादक - किशोरी लाल व्यास प्रकाशक - इतिहास संकलन योजना

    आर्यों की आदिभूमि

    आर्यों की आदिभूमि[संपादित करें]

    आर्य प्रजाति की आदिभूमि के संबंध में अभी तक विद्वानों में बहुत मतभेद हैं। भाषावैज्ञानिक अध्ययन के प्रारंभ में प्राय: भाषा और प्रजाति को अभिन्न मानकर एकोद्भव (मोनोजेनिक) सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ और माना गया कि भारोपीय भाषाओं के बोलनेवाले के पूर्वज कहीं एक ही स्थान में रहते थे और वहीं से विभिन्न देशों में गए। भाषावैज्ञानिक साक्ष्यों की अपूर्णता और अनिश्चितता के कारण यह आदिभूमि कभी मध्य एशिया, कभी पामीर-कश्मीर, रही है। जबकि भारत से बाहर गए आर्यन के निशान कभी आस्ट्रिया-हंगरी, कभी जर्मनी, कभी स्वीडन-नार्वे और आज दक्षिण रूस के घास के मैदानों में ढूँढ़ी जाती है। भाषा और प्रजाति अनिवार्य रूप से अभिन्न नहीं। आज आर्यों की विविध शाखाओं के बहूद्भव (पॉलिजेनिक) होने का सिद्धांत भी प्रचलित होता जा रहा है जिसके अनुसार यह आवश्यक नहीं कि आर्य-भाषा-परिवार की सभी जातियाँ एक ही मानववंश की रही हों। भाषा का ग्रहण तो संपर्क और प्रभाव से भी होता आया है, कई जातियों ने तो अपनी मूल भाषा छोड़कर विजातीय भाषा को पूर्णत: अपना लिया है। जहां तक भारतीय आर्यों के उद्गम का प्रश्न है, भारतीय साहित्य में उनके बाहर से आने के संबंध में एक भी उल्लेख नहीं है। कुछ लोगों ने परंपरा और अनुश्रुति के अनुसार मध्यदेश (स्थूण) (स्थाण्वीश्वर) तथा कजंगल (राजमहल की पहाड़ियां) और हिमालय तथा विंध्य के बीच का प्रदेश अथवा आर्यावर्त (उत्तर भारत) ही आर्यों की आदिभूमि माना है। पौराणिक परंपरा से विच्छिन्न केवल ऋग्वेद के आधार पर कुछ विद्वानों ने सप्तसिंधु (सीमांत, उत्तर भारत एवं पंजाब) को आर्यों की आदिभूमि माना है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने ऋग्वेद में वर्णित दीर्घ अहोरात्र, प्रलंबित उषा आदि के आधार पर आर्यों की मूलभूमि को ध्रुवप्रदेश में माना था। बहुत से यूरोपीय विद्वान् और उनके अनुयायी भारतीय विद्वान् अब भी भारतीय आर्यों को बाहर से आया हुआ मानते हैं।
    अब आर्यों के भारत के बाहर से आने का सिद्धान्त (AIT) गलत सिद्ध कर दिया गया है। ऐसा माना जाता है कि इस सिद्धान्त का प्रतिपादन करके अंग्रेज़ और यूरोपीय लोग भारतीयों में यह भावना भरना चाहते थे कि भारतीय लोग पहले से ही गुलाम हैं। इसके अतिरिक्त अंग्रेज इसके द्वारा उत्तर भारतीयों (आर्यों) तथा दक्षिण भारतीयों (द्रविड़ों) में फूट डालना चाहते थे। इसी श्रंखला में अंग्रेजों ने शूद्रों को दक्षिण अफ्रीका से अपनी निजी सेवा व् चाटुकारिता के लिए एवं भारत में आर्यों से युद्ध करने के लिए अपनी सैनिक टुकडियां बनाने हेतु लाया गया बताया है ! जबकि वास्तव में शुद्र वो लोग थे जो अर्धनग्न अवस्था में जंगलों में अशिक्षित व् पशुओं जैसा जीवन व्यतीत करते थे ![5]